प्राचीन भारत में भौतिकी

(Physics in Ancient India)

 

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वायु विमर्श

 

वायु विमर्श (Gaseous State)

द्रवों के साथ ऊष्मा (Heat) के संयोग के कारण द्रवों के अणुओं की गतिज ऊर्जा में वृद्धि होती है, फलत: द्रव के अणुओं के मध्य कार्य करने वाले द्रवकारक बल (cohesive force) में न्यूनता परिलक्षित होती है। अत: यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि 'द्रवों' के अणुओं की गतिज ऊर्जा में वृद्धि और पृष्ठतनाव है। ऐसी गैस को वास्तविक गैस (Naturization) का रहस्य जाना जाता है, क्योंकि दाब और तापमान के सामान्य अन्तर से ही पुन: द्रव में उसको परिवर्तित किया जा सकता है और जिस गैस का तापमान 'क्रांतिक तापमान' को पार कर जाय, तो ऐसी अवस्था में प्राप्त गैस को पर्याप्त दाब पर भी पुन: द्रव रूप में परिणत नहीं किया जा सकता, यह गैस की आदर्श अवस्था (Perfect Gas) 'आदर्श वायु' होती है।

गैस (Gas) में भार (Mass) निहित होता है। इसे अधोलिखित उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे-किसी वायुरहित गुब्बारे (Balloon) का भारमान लेकर उसमें वायुपूरक यंत्र द्वारा वायु भरने पर जब उस गुब्बारे का पुन: भारमान लिया जाता है तो उसके भारमान में वृद्धि परिलक्षित होती है, इस आधार पर यह सिद्ध होता है कि गैस में 'भार' होता है।

वायु (Gas) पदार्थ की ही अवस्था विशेष है। इस हेतु वस्तु (पदार्थ) विशेष गैस में गन्ध और रूप भी परिलक्षित होते हैं-उदाहरण 'क्लोरीन गैस' (Chlorine Gas)

वैशेषिकाचार्य वायु (Gas) को अनुष्णाशीत ताप वाला मानते हैं। अर्थात् गैस के तापमान को न ऊष्ण समझा जाता है और न ही शीतल। सामान्यतया तापमान का अनुभव गैस से सम्बन्धित उसके चारों ओर फैले वातावरण से किया जाता है।

गैस के साथ ऊष्मा का संयोग या विभाग गैस तापमान में वृद्धि और ह्रास को प्रदर्शित करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ऊष्मा के साथ संयोग होने से तापमान में वृद्धि होगी और यदि ऊष्मा के साथ विभाग हो, तो तापमान में ह्रास होगा।

विभिन्न गैसों का परस्पर सम्मेलन हो सकता है।

विभिन्न गैसों के अणु ऊष्मा के संयोग से परमाणुओं में विखण्डित होकर भिन्न गुणों वाले परमाणुओं का पुनर्निर्माण कर सकते हैं। इस विषयक कोई भी शंका नहीं हो सकती, क्योंकि भौतिकी के अनुसार गैस स्वतन्त्र रूप से भौतिक सत्य (Physical entity) नहीं है, प्रत्युत पदार्थ की ही एक अवस्था है। इस कारण एक वास्तविक गैस उन अणुओं से बनी होती है जो वास्तविक द्रव और ठोस के मौलिक अंश होते हैं।

सामान्यतया शब्द-वृत्ति (wave aspect) को आकाश (Ākaśa) का गुण कहा जाता है। तथापि वैशेषिकों ने वायु को श्रव्य तरंगों का वाहक (Medium) कहा है। वायु में ध्वनि के विस्तार को त्रयोदश परिच्छेद में विवेचित किया गया है।

प्रकृत प्रसङ्ग में यह स्पष्ट धारणा होनी चाहिये कि वैशेषिक आचार्यो ने वायु का आयतन (Volume), पार्थिवमान (mass), दाब और तापमान (Pressure and Temperature) इत्यादि दृष्टियों से अध्ययन नहीं किया है, इनकी इस सम्बन्ध में व्याख्या गुणात्मक (Quantitative) ही है। परन्तु गैस सम्बन्धी गुणों को ध्यान में रखते हुए समकालिक आयुर्वेदादि साहित्य की सहायता से वैशेषिक दर्शन का अध्ययन विस्तारपूर्वक किया जा सकता है।

 

 

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